मानव चलचित्र

चलचित्र सा हो चला है मन
चलचित्र सा हो चला है जीवन
ना परवाह किसी की
ना इज्जत किसी की
आत्मा ना जाने कहाँ विचरण कर रही,
मानवता मुँह ताके बस देख रही
अत्याचार बन चुका व्यवसाय अब
चलचित्र सा बन चुका है मनुष्य अब,
धोखा, फरेब और झूठ का
बढ़ गया व्यापार अब,
संस्कार और देशप्रेम का
कम हो चला रुबाब अब,
वक़्त बीत रहा तूफ़ान की गति समान,
हो रहा विनाश धरती का
अब तो जाग जा इंसान,
छोड़ यह कुकृत्य,संस्कार का पाठ पढ़,
आत्मा को ज्ञान का पाठ पढ़ा
काम, क्रोध लोभ मोह का न हो कहीं भी अस्तित्व,
भक्ति सागर का रसपान कर
पाना है सच्चाई का भक्तित्व...

निकेता पाहुजा
रुद्रपुर उत्तराखंड

रश्मिरथी

Author & Editor

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