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रश्मिरथी

 



प्रभा प्रभात संध्या निशा दिन रात लिखुंगा भाष भाष्य भाव वर्तमान अतीत भविष्य कि बात लिंखुगा।।

जीवन का शुभ मंगल नैतिकता
मौलिकता मूल्य शब्द स्वर एक क्रांति लिखुंगा।।

नित्य निरंतर काल समय जीवन संग्राम कुरुक्षेत्र पथ विजय शत्र शात्र अविराम लिंखुगा।।

जीवन सार्थक सत्य संकल्प तप भगीरथ पराक्रम पुरुषार्थ शंखनाद लिखुंगा।।

निश्छल निर्विकार युग उत्क्रर्ष का पल पल पग भाग्य भारत का स्वाभिमान लिखुंगा।।

बचपन किशोर युवा चरित्र निर्माण
विकास अनुष्ठान संकल्प साध्य साधना अभिनंन्दन अभिमान लिखुंगा।।

कन्या बेटी नारी युग उत्थान भागीदार गौरव गरिमा युग पुरुष औरत औकात आवाहन शंखनाद  लिखुंगा।।

सत्य सनातन संस्कृति सांस्कार भारत श्रेष्ठ नेक आराधना का जन आहुति अपरिहार्य लिखुंगा।।

जन जन की खुशहाली हरियाली
आहल्लादित मन स्वर शब्द  ज्ञान विज्ञान साहित्य समाज सत्कार लिखुंगा।।

नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश।।
रश्मिरथी

 



शक्तिशाली का गुणगान करना
फायदे का सौदा रहा है हमेशा से,
यह जानते हुए भी
कमजोर के पक्ष में जो इंसान
आवाज उठाएगा
वही इंसान एक दिन
न्याय की सही परिभाषा गढ़ पाएगा।

धनवान का गुणगान करना
फायदे का सौदा रहा है हमेशा से,
यह जानते हुए भी
गरीब के पक्ष में जो इंसान
आवाज उठाएगा
वही इंसान एक दिन
समानता की सही परिभाषा गढ़ पाएगा।

सरकार का गुणगान करना
फायदे का सौदा रहा है हमेशा से,
यह जानते हुए भी
जनता के पक्ष में जो इंसान
आवाज उठाएगा
वही इंसान एक दिन
लोकतंत्र की सही परिभाषा गढ़ पाएगा।

धारा के साथ बहना
ज्यादातर लोगों ने चुना है हमेशा से,
यह जानते हुए भी
धारा के विपरीत तैरने का हौसला
जो इंसान रख पाएगा
वही इंसान एक दिन
संघर्ष की सही परिभाषा गढ़ पाएगा।

                                 जितेन्द्र 'कबीर'
                                 
यह कविता सर्वथा मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित है ।
साहित्यिक नाम - जितेन्द्र 'कबीर'
संप्रति - अध्यापक
पता - जितेन्द्र कुमार गांव नगोड़ी डाक घर साच तहसील व जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश

बादल चाचा क्यूं बरसे

रश्मिरथी
जनवरी माह में दिल्ली की कड़कडाती बारिश की 
👩‍👧 बाल कविता👩‍👧
बादल चाचा बादल चाचा क्यूं बरसे
इतने गरज़ गरज़ कर क्यूं बरसे
कड़ कड़ बिजली बुआ बरसती
क्या वो हम से कहने को कुछ है तरसती
गड़ गड़ तुम क्या बतलाते
घुमड़ घुमड़ रौब जताते
कितना चिढ़ चिढ़ कर हमें डराते
सर्दी में भी हर घण्टे पानी टपकाते
 ठिठुरन इतनी ना बढ़ाओ
थोड़ा हम पर दया दिखाओ
जब सावन आये तब आजाना
स्वागत करें तो मत इतराना
अभी तो तुम घर जाओ
मुझको सर्दी लगती है
ओर पानी न बरसाओ।।

मम्मा की लेखनी
ज़िया की जुबानी👩‍👧
( ज़िया )भारती प्रवीण...✍️💕

मानव चलचित्र

रश्मिरथी
चलचित्र सा हो चला है मन
चलचित्र सा हो चला है जीवन
ना परवाह किसी की
ना इज्जत किसी की
आत्मा ना जाने कहाँ विचरण कर रही,
मानवता मुँह ताके बस देख रही
अत्याचार बन चुका व्यवसाय अब
चलचित्र सा बन चुका है मनुष्य अब,
धोखा, फरेब और झूठ का
बढ़ गया व्यापार अब,
संस्कार और देशप्रेम का
कम हो चला रुबाब अब,
वक़्त बीत रहा तूफ़ान की गति समान,
हो रहा विनाश धरती का
अब तो जाग जा इंसान,
छोड़ यह कुकृत्य,संस्कार का पाठ पढ़,
आत्मा को ज्ञान का पाठ पढ़ा
काम, क्रोध लोभ मोह का न हो कहीं भी अस्तित्व,
भक्ति सागर का रसपान कर
पाना है सच्चाई का भक्तित्व...

निकेता पाहुजा
रुद्रपुर उत्तराखंड

संस्कृत की विशेषता

रश्मिरथी
१) संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक (वेद) की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं किसी संशय की संभावना नहीं है।

(२) इसकी सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है।

(३) सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी होने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है।

(४) इसे देवभाषा माना जाता है।

(५) संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा भी है, अतः इसका नाम संस्कृत है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है।

संस्कृत > सम् + सुट् + 'कृ करणे' + क्त, ('सम्पर्युपेभ्यः करोतौ भूषणे' इस सूत्र से 'भूषण' अर्थ में 'सुट्' या सकार का आगम/ 'भूते' इस सूत्र से भूतकाल को द्योतित करने के लिए संज्ञा अर्थ में क्त-प्रत्यय /कृ-धातु 'करणे' अर्थ में अर्थात् विभूूूूषित, समलंकृत या संस्कारयुक्त 
संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है।

(६) शब्द-रूप - विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं।

(७) द्विवचन - सभी भाषाओं में एकवचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है।

(८) सन्धि - संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। संस्कृत में जब दो अक्षर निकट आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जा है ।

(९) इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिये सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।

(१०) शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

(११) संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। जैसे - अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनो ही ठीक हैं।

(१२) संस्कृत विश्व की सर्वाधिक 'पूर्ण' एवं तर्कसम्मत भाषा है।

(१३) संस्कृत ही एक मात्र साधन हैं जो क्रमश: अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं। इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ ग्रहण करने में सहायता मिलती है।

(१४) संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरन्तर होती आ रही है। इसके कई लाख ग्रन्थों के पठन-पाठन और चिन्तन में भारतवर्ष के हजारों पुश्त तक के करोड़ों सर्वोत्तम मस्तिष्क दिन-रात लगे रहे हैं और आज भी लगे हुए हैं। पता नहीं कि संसार के किसी देश में इतने काल तक, इतनी दूरी तक व्याप्त, इतने उत्तम मस्तिष्क में विचरण करने वाली कोई भाषा है या नहीं। शायद नहीं है। दीर्घ कालखण्ड के बाद भी असंख्य प्राकृतिक तथा मानवीय आपदाओं (वैदेशिक आक्रमणों) को झेलते हुए आज भी ३ करोड़ से अधिक संस्कृत पाण्डुलिपियाँ विद्यमान हैं। यह संख्या ग्रीक और लैटिन की पाण्डुलिपियों की सम्मिलित संख्या से भी १०० गुना अधिक है। निःसंदेह ही यह सम्पदा छापाखाने के आविष्कार के पहले किसी भी संस्कृति द्वारा सृजित सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत है।

(१५) संस्कृत केवल एक मात्र भाषा नहीं है अपितु संस्कृत एक विचार है। संस्कृत एक संस्कृति है एक संस्कार है संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है  वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना है।

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  • Syed Faizan AliMaster / Computers
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